गोरखपुर की घटना पर इस बिहारी पत्रकार ने जो कहा उसे पढ़कर आप भी करना चाहेंगे शेयर…

gorakhpur tragedy

ब्लॉग. हृषिकेश शर्मा. देश के किसी अस्पताल में आजादी के 70 वर्षों के बाद भी इस तरह की मौतें यहाँ की व्यवस्था को बयां करती है. यह व्यवस्था जिसे आप किसी सरकार से नहीं जोड़ सकते. व्यवस्था जिसे आपने कांग्रेस के समय भी जिया और भाजपा के समय भी. यहाँ तुलनात्मक अध्ययन करने जैसी भी कोई चीज़ नहीं है. न ही कांग्रेस ने कुछ किया था और न ही भाजपा ने आकर कुछ बदला है. अमेरिका जैसे देश में ऐसी जानें ओबामा के समय भी बचाई जा सकती थी और आज ट्रम्प के समय भी बचा ली जायेगी. ये घटनायें देश में बढ़ती पूंजीवादी ताकतों का मानक है.

यह हमारी संकीर्ण मानसिकता का भी मानक है. अमेरिका, जापान और फ़्रांस जैसे विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय हमसे कहीं ज़्यादा है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के लिये वो पूर्ण रूप से सरकार पर ही निर्भर हैं. उन्होंने सरकार से ऐसी व्यवस्था का निर्माण कराया जो उसके उच्च से निम्न वर्ग सबके लिये समान ही है. हमारे यहाँ सरकारें नाकाम हुई तो उसने अपने पैरोडी खड़े कर दियेे. हमारा जीवन स्तर बढ़ा तो हमने सरकारी संस्थाओं पर अपनी निर्भरता खत्म की. फ़िर यह अस्पताल और स्कूल उनलोगों का होकर रह गया जो सरकार के पैरोडी तक जाने का सोच भी नहीं सकते.

अब देखिये कैसी स्थिति बनी. जिनकी हाथों में पूँजी और ताकत है उसी जनता ने अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ उसे फलने फूलने का मौका दिया. देश की मीडिया ने उस अस्पताल की रिपोर्टिंग किसी के मरने से पहले नहीं की. जब हमारी आँखें नहीं गई तो व्यवस्था में भ्रष्टाचार आया. सरकार अपने जीडीपी का बड़ा प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है जिसे बजट के दिन से ही हम अपना नहीं मानते. जिसे हमने अपना नहीं माना उसे इस विभाग के बाबू लोगों ने अपना मान लिया.

जिस पैसे से अस्पताल की व्यवस्था में सुधार होता वो इनके घर का फ़र्नीचर लगाने में खर्च हो गया. किसी एक रिपोर्ट के छपने या दिखाने से जब संयोग से कुछ करवाई हो जाती है, तो सप्ताह भर मीडिया हाउस उसका क्रेडिट लिये फ़िरती है. क्या इन घटनाओं को हम पत्रकारिता की विफ़लता नहीं कह सकते. हम इनका भी दोष नहीं कह सकते. आपके घर के महंगे स्मार्टटीवी में स्मार्ट नेता ही ज़्यादा जँचते हैं. इतना खर्च करके टीवी लाओ और उसमें देखने को अस्पताल के बाहर वो फटे-पुराने कपड़े में लोग मिलें तो आत्मसंतुष्टि नहीं मिलेगी. जब भी ऐसी कोई रिपोर्ट आती है तो हम खुद आगे बढ़ जाते हैं कि ये सब समस्या तो हर जगह होती ही है.

तब हम इस मंच पर उसका उल्लेख नहीं करते. हमारी संवेदना नहीं मरती. बस थोड़ा शर्म सा लगता है कि कोई ये न कह दे कि अरे इतने तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहे हैं और तुम्हारे पास कहने को बस यही बचा है. इसलिये मैं मानता हूँ कि इस नाकाम व्यवस्था के बीच सरकार तो है ही लेकिन उससे कहीं ज़्यादा इस देश की जनता है. हम सालों व्यवस्था की नाकामी पर बस चुटकी लेते हैं और किसी घटना के बाद फेसबुक पर थोड़ी सी घड़ियाली आँसू बहा देते हैं. अब तो विलाप करने के लिये शब्द की भी ज़रूरत नहीं होती. फेसबुक पर आँसू रियेक्ट ने काम आसान कर दिया है. बस एक रियेक्ट के साथ ही हम अपनी व्यवस्था और सरकार की आलोचना और उसके साथ-साथ पीड़ितों के दुख में भी शामिल हो जाते हैं.

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