बिहार में नकली और कम गुणवत्ता वाले दवाओं का धरल्ले से चल रहा व्यापार, कब होगी कार्रवाई?

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सौरभ कुणाल. भारत की दो दवा कम्पनियाँ बीते दिनों में मीडिया में चर्चा का विषय बनी रहीं. भारतीय मूल की किन्तु अब जापानी कम्पनी के प्रबन्ध तले चल रही कम्पनी ‘रैनबैक्सी’ तब चर्चा में आई जब इस कम्पनी को कई करोड़ अमेरिकी डॉलरों का जुर्माना हुआ और इसके कामकाज पर कई सवाल उठे. इसके पश्चात एक अन्य बड़ी भारतीय कम्पनी ‘वोकहार्ड’ का मामला खड़ा हो गया. इस कम्पनी के एक प्लांट को अमेरिकी दवा कण्ट्रोल एजेंसी एफ.डी.ए. की तरफ से चेतावनी मिली और साथ ही ब्रिटेन की तरफ से इस कम्पनी के 16 उत्पादों पर गुणवत्ता की कमी को लेकर अपने देश में प्रतिबन्ध लगाने का मामला भी गरमाया रहा. इन मामलों के प्रकाश में आने से भारत और समस्त दुनिया में होते दवाओं के कारोबार में कम गुणवत्ता वाली और नकली दवाओं के मसले को भी छेड़ा है.

कम गुणवत्ता वाली (सब-स्टैण्डर्ड) दवाएँ वह होती हैं जिनमें दवा की मात्र निर्धारित मात्रा से कम होती है अथवा उनका रासायनिक सूत्रीकरण इस प्रकार का होता है कि उसकी शरीर के भीतर कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है. दूसरी ओर नकली दवाएँ वह होती हैं जिनमें गोलियाँ, कैप्सूल अथवा टीकों में वास्तव में दवाई होती ही नहीं, दवाई की जगह चाक-पाउडर, पानी या महँगी दवाई के स्थान पर सस्ती दवाई का पाउडर मिला दिया जाता है. इसके अलावा समाप्त अवधि वाली (एक्सपायर्ड) दवाओं को पुनः पैक करने का धन्धा भी होता है.

शासन के नियमों को ताक पर रखकर नकली और कम गुणवत्ता वाले घटिया दवाईयों का धंधा बिहार में जोरो से चल रहा है. शहर में नकली दवाइयां खपाने का कारोबार बड़ी तेजी से जड़े जमाता चला जा रहा है. मेडिकल स्टोर वाले नकली दवा बड़ी आसानी से ग्राहक को थमा देते है. जिससे काफी खर्चा होने के बाद भी मरीज की बीमारी ठीक नहीं होती वहीं गरीब व असहाय मरीज कर्ज की गर्त में समाकर अपना घर बार बेच रहे है और सही दवा न मिलने से बीमारी गंभीर रूप धारण कर मरीज को यमलोक पहुंचा देती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल 2,00,000 मौतें नकली या घटिया दवाओं के कारण होती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में घटिया या नकली दवाओं का कारोबार 2010 में 75 अरब अमेरिकी डॉलर था जो 2005 के मुकाबले दोगुना था. कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार, यह कारोबार अब 200 अरब डॉलर सालाना तक पहुँच चुका है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में कुल बिक रही दवाओं का 10 प्रतिशत से अधिक नकली या घटिया दवाओं का है, विकासशील देशों में चूँकि दवाओं की गुणवत्ता नियंत्रण हेतु प्रशासनिक और कानूनी प्रबन्ध या तो है ही नहीं या बहुत ही कमज़ोर होते हैं (भारत भी इन्ही देशों में आता है), भारत में हुए विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार 12.25 प्रतिशत दवाइयाँ या तो नकली हैं या कम गुणवत्ता वाली हैं. मगर भारत की दवा नियंत्रण संस्था के अनुसार नकली दवाओं का प्रतिशत मात्र 0.4 प्रतिशत है.

लेकिन इन दावो के बावजुद बिहार में नकली और कम गुणवत्तावाली दवाओं का बाजार तेजी से फल-फूल रहा है. रिपोर्ट बताती है कि हर माह जांच के लिए लैब आनेवाली दवाओं में बड़ी संख्या सब स्टैंडर्ड दवाओं की होती है. ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के अनुसार दवाओं की जांच और रिपोर्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही कर सकते हैं. वहीं, अगमकुआं स्थित सूबे बिहार की इकलौती औषधि जांच प्रयोगशाला में दवाओं की गुणवत्ता के नाम पर खानापुर्ति हो रही है. वजह, कभी-कभी तो नाम मात्र के एनालिस्ट और कभी उनका भी नहीं होना है.

बिहार में नकली दवाइयों के व्यापार के तार मध्य प्रदेश के गुना जिले से लेकर उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद तक जुडे हैं, हालाकि नकली दवाईयों के रोकथाम के लिए तो पुलिस अकसर धड-पकड करती है, लेकिन वो भी मात्र खानापुर्ति के लिए. कुछ अरसा पहले पुलिस कार्यवाई में पटना के जी एम दास रोड और गया में आजाद पार्क के पीछे स्थित दवा मंडी में छापेमारी कर बड़े पैमाने पर नकली दवाओं के गोरखधंधे का खुलासा किया था. किन्तु कठोर कानुनो के आभाव में अक्सर ऐसे कारोबारी बच निकलते है, क्योकि ड्रग एंड कास्मेटिव एक्ट की इन धाराओं में सजा का प्रावधान अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माना. ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट के तहत धारा 18 सी (बिना लायसेंस के दवा स्टोरेट) एवं 18 ए (बिना लायसेंस के दवा बनाने) में जुर्म को साबित करना पुलिस के लिए टेडी खीर साबित होती है.


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